मसान क्रिया

मसान क्रिया और अघोर परंपरा

मसान क्रिया क्या होती है ?

मसान क्रिया तांत्रिक साधना की एक अत्यंत गूढ़ और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इसका उद्देश्य किसी आत्मा को वश में करना नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद शेष रह गई चेतन ऊर्जा के साथ संपर्क या साधना करना होता है।
यह क्रिया सामान्यतः श्मशान, निर्जन स्थान या रात्रि के विशिष्ट काल में की जाती है, क्योंकि ऐसे स्थानों को चेतना और मृत्यु के बीच की सीमा माना जाता है।

तांत्रिक शास्त्रों के अनुसार, मसान क्रिया केवल वही साधक कर सकता है जिसने मन, भय और वासनाओं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त किया हो। अधूरी तैयारी या अहंकार के साथ की गई मसान क्रिया साधक के लिए मानसिक, आध्यात्मिक और कभी-कभी शारीरिक रूप से भी घातक सिद्ध हो सकती है।
इसी कारण प्राचीन ग्रंथों में मसान क्रिया को गुप्त, सीमित और गुरु-निर्देशित साधना बताया गया है, न कि प्रदर्शन या शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम।

मसान शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

सामान्य रूप से लोग मसान शब्द को भूत-प्रेत या डरावनी आत्मा से जोड़ देते हैं, लेकिन तांत्रिक शास्त्रों में मसान का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा, सूक्ष्म और दार्शनिक है।
मसान दरअसल मृत्यु के बाद बची हुई मानव चेतना की ऊर्जा अवस्था (Residual Conscious Energy) को दर्शाता है।

जब मनुष्य का स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, तब भी उसके कर्म, स्मृति और संस्कार तुरंत समाप्त नहीं होते। यही संस्कार जब किसी विशेष परिस्थिति, स्थान या मानसिक स्थिति में स्थिर हो जाते हैं, तो तंत्र परंपरा में उसे मसान कहा जाता है।
इस प्रकार मसान कोई कल्पना नहीं, बल्कि मृत्यु और चेतना के बीच की एक मध्य अवस्था है।

मसान साधक और अघोर परंपरा

मसान सिद्धि की साधना करने वाले साधक प्राचीन काल से अघोर, औघड़, कापालिक और कुछ ग्रामीण परंपराओं में सरभंगी कहलाते रहे हैं। अलग–अलग क्षेत्रों में इन्हें मसान जोगी के नाम से भी जाना जाता है। ये साधक समाज की सामान्य धारणाओं, पवित्र–अपवित्र के भेद और भय की सीमाओं को लाँघकर साधना करते हैं। अघोर परंपरा में मसान साधना को किसी डरावनी क्रिया के रूप में नहीं, बल्कि चेतना की गहन अवस्था को समझने का माध्यम माना गया है, जहाँ साधक मृत्यु के सत्य से सीधे साक्षात्कार करता है।

अघोर मार्ग के साधक भय, सामाजिक बंधन और देह-अहंकार से परे होकर साधना करते हैं। इनके लिए श्मशान भय का स्थान नहीं, बल्कि जागरण और बोध का क्षेत्र होता है। जहाँ सामान्य व्यक्ति मृत्यु से भागता है, वहीं अघोरी साधक वहीं स्थिर होकर यह समझता है कि देह नश्वर है, पर चेतना नष्ट नहीं होती। मसान साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर जमे हुए संस्कारों, आसक्तियों और अज्ञान के बंधनों को तोड़ने का प्रयास करता है। यही कारण है कि अघोर परंपरा को आत्म-साक्षात्कार की सबसे कठोर लेकिन सत्यवादी साधना माना गया है।

Aghordham में अघोर परंपरा का उद्देश्य केवल साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव पीड़ा से मुक्ति भी है। जब किसी अनुयायी या साधक पर तांत्रिक बाधा, नकारात्मक ऊर्जा या अदृश्य बंधन प्रभाव डालता है, तब अघोर मार्ग की मसान क्रिया के माध्यम से उसे उससे मुक्त करने का प्रयास किया जाता है। यह क्रिया किसी को हानि पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि असंतुलित चेतन ऊर्जा को शांत और मुक्त करने की प्रक्रिया होती है। गुरु–परंपरा और शास्त्रीय विधि से की गई यह साधना व्यक्ति को भय, मानसिक कष्ट और तांत्रिक प्रभाव से बाहर निकालकर उसे पुनः जीवन की सहज धारा से जोड़ती है।